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vastu shastra

Vastu Blog

"ईश पूजा, नैरित भारी, अग्नि अगन जरावै,वायु खुल्ला, नाभि खाली, उही घर राम रखावे" 

अर्थात:- जिस घर में ईशान्य में पूजा होती है, नेॠत्य क्षेत्र भारी हो, आग्नेय कोण में अग्नि या बिजली कि व्यवस्था हो व वायव्य कोना खुला हो तथा जिसका ब्रह्म स्थान (नाभि क्षेत्र) खाली हो उस भवन के निवासियों पर ईश्वर की कृपा दृष्टि रहती है |

Meaning : The house where prayers are conducted in the Ishanya, Netryatva area is heavy, availability of fire and electricity in the Agneya zone, the Vayavya zone is open and the Brahma zone is empty, is the house where blessings of God abode.


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"ॐ वास्तोष्पते प्रतिजानीह्यस्मान्त्स्वावेशोऽअनमीवो भवनः ॥
यत्वे महे प्रतितन्नो जुषस्व शन्नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ॥"

अर्थात:- हे वास्तोष्पति देव !आप हमारे द्विपद (मनुष्य) एवं हमारे चतुष्पद(वाहन, पशुधन) का कल्याण व रक्षा करें । पिता की तरह हमें सुरक्षा, सुविधा एवं संरक्षण देवें । मनुष्य, परिवार, समाज, पशुजगत एवं जीवजगत के योगसेम (सुरक्षा एवं समृद्धि) में हमारी सहायता करें । हमारा कल्याण करें ।


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"स्नानस्य पाकशयनास्त्रभुजेश्च धान्य भाण्डारदैवतगृहाणि च पूर्वतः स्युः।
तन्मध्यतोऽथ मथनाज्यपुरीषविद्याभ्यासाख्यरोदनरतौषध सर्वधाम।।"
 

अर्थात:- पूर्व में स्नान का गृह, अग्निकोण में पाक गृह (रसोई), दक्षिण दिशा में शयन का स्थान नैऋत्य कोण में हथियार का गृह, पश्चिम दिशा में भोजन गृह और ईशान कोण में देवता का गृह बनाना उत्तम होता है । एवं पूर्व और अग्नि-कोण के बीच में मंथन (दही मथने) का, अग्नि-कोण और दक्षिण के बीच में घी रखने का, दक्षिण और नैऋत्य के बीच में पुरीष (पाखाना) का, नैऋत्य और पश्चिम के बीच में विद्याभ्यास (पढने) का, पश्चिम और वायव्य के बीच में रोदन का, वायव्य और उत्तर के बीच में रत (मैथुन) का, उत्तर और ईशान के बीच में औषध का घर और ईशान तथा पूर्व के बीच में सर्वधाम बनाना चाहिये ॥