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वास्तु टिप्सः भूखंड बनाने के पहले जमीन की परीक्षा कैसे करें

जब भी भवन बनाने के लिए नया भूखंड (जमीन) खरीदनी हो तो उस जमीन की भली-भांति परीक्षा कर लेनी चाहिए। इस परीक्षा से उस भूखंड का विस्तृत विवरण प्राप्त हो जाता है तथा उसकी प्रकृति का पता चल जाता है जिसके आधार पर यह निर्णय किया जाता है कि उस जमीन पर मकान बनाना शुभ रहेगा या अशुभ। इसके लिए शास्त्रों में कई प्रकार की परीक्षाएं बताई गई हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

गरुड़ पुराण में वर्ण के आधार पर भूमि के चार प्रकार बताए गए हैं। श्वेत वर्ण, पीत वर्ण, श्याम वर्ण एवं रक्त वर्ण। इनमें श्वेत वर्ण ब्राह्मणों के लिए, पीत वर्ण भूमि वैश्यों के लिए, रक्त वर्ण भूमि क्षत्रियों के लिए तथा श्याम वर्ण भूमि शूद्र वर्ग के लिए बताई जाती है। हालांकि वर्तमान में वर्ण व्यवस्था धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है, ऐसे में इस नियम का उपयोग थोड़ा परिवर्तन कर दिया गया है। यथा श्वेत वर्ण की भूमि विद्या-अध्यापन से जुड़े कामों के लिए, पीत वर्ण भूमि व्यावसायिक (कॉमर्शियल) उपयोग के लिए, रक्त वर्ण भूमि शस्त्र विद्या सीखने सिखाने संबंधी कार्यों, तथा शूद्र वर्ण भूमि सेवा संबंधी कार्यों के लिए उपयोग लेनी चाहिए।

 

भूमि परीक्षण का एक अन्य तरीका यह है कि भूमि के बीचों-बीच अपने हाथ की सबसे छोटी अंगुली (कनिष्ठिका अंगुली) से एक छोटा सा गड्डा खोद लेना चाहिए। फिर उसमें एक देशी घी का चौमुखा दीपक जलाना चाहिए। इस दीपक में चारों दिशाओं की तरफ एक-एक बत्ती होनी चाहिए। जिस भी दिशा की बत्ती सबसे अधिक समय तक जले, भूमि को उसी प्रकृति का समझना चाहिए। उदाहरणस्वरूप पूर्व दिशा की बत्ती सबसे अंत तक जले, तो वह भूमि ब्राह्मण के लिए, पश्चिम दिशा की बत्ती जले तो वह वैश्य के लिए, यदि उत्तर दिशा की बत्ती सबसे लंबे समय तक जले तो वह भूमि शूद्र के लिए तथा दक्षिण दिशा की बत्ती सबसे लंबे समय तक जले तो वह भूमि क्षत्रिय के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। यदि सभी दिशाओं की बत्ती समान रूप से जलती रहे तो वह भूमि सभी लोगों के लिए उत्तम रहेगी।


भूमि परीक्षण के लिए इन दोनों उपायों के अलावा एक अन्य उपाय भी काम में लिया जाता है। इस उपाय में भूमि के बीचोंबीच एक फुट लंबा, एक फुट चौड़ा तथा एक फुट गहरा गड्डा खोद लिया जाता है। इस गड्डे को जल से पूरा भरने के बाद गड्डे से गिनती करते हुए एक सौ कदम दूर जाना चाहिए तथा वापस लौटकर पानी को देखना चाहिए। यदि पानी जितना भरा गया था, उतना ही रहता है तो, भूमि निर्माण के लिए अत्यंत उत्तम मानी जाती है, यदि जल पहले से थोड़ा कम हो जाए तो भूमि पर मध्यम माना जाता है, इस भूमि पर निर्माण किया जा सकता है, परन्तु यदि गड्डे में बिल्कुल भी जल नहीं बचे तो उस भूमि पर किसी भी स्थिति में निर्माण नहीं करना चाहिए।
जिस भूमि पर बहुत पुराने पेड़ हो या उस जमीन पर पुराने समय में कोई मंदिर, पितृ का स्थान अथवा श्मशान रहा हो या जहां पर बहुत सारे कुत्ते रहते हो तथा जमीन खोदते हों, उस जमीन पर निर्माण करने से वहां रहने वालों का सौभाग्य खत्म हो जाता है।
इनके अलावा भी कई अनेक प्रकार के भूमि परीक्षण के उपाय बताए गए हैं परन्तु आज के वैज्ञानिक तथा आपाधापी के युग में इन नियमों की पूरी तरह परीक्षा नहीं की जा सकती। अतः हमें व्यावहारिक होकर इन नियमों का यथासंभव पालन करना चाहिए।